Has Vishwaguru Or Vishwaatma Become So Feeble And Lethargic

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प्रश्न: गुरुजी, ये कहाँ का न्याय है कि किसी समुदाय से ताल्लुक़ रखने वाला कोई व्यक्ति दिव्य सनातन मानवीय मूल्यों, देश की संवैधानिक भावना और वैधानिक मर्यादा को लांघकर किसी एक ऐसे मझहब/रिलीजन से संबद्ध किसी व्यक्ति की निंदा का आरोप, किसी अन्य ऐसे नागरिक पर लगाकर जो कि उस मझहब से असंपृक्त हो उसके प्रति किसी मज़हबी मान्यता का हवाला लेकर कोई ऐसा घृणित अमानवीय कृत्य कर डाले जो कि वर्तमान समुचित शिक्षित सभ्य वैश्विक समाज के लिए सोचना भी अकल्पनीय हो, ? यहाँ तक कि खुले आम मारने का ऐलान भी कर डाले और तब भी उस मझहब या समुदाय का बड़ा हिस्सा तथा सभी देशों का बृहत्तर वैश्विक बौद्धिक समाज ऐसे कृत्यों की भर्त्सना तक ठीक से न करें ? क्या विश्वगुरु या विश्वात्मा इतना निर्वीर्य और निस्तेज हो गया है कि निर्भय होकर न्याय को न्याय और अन्याय को अन्याय भी न कह सके?

 

उत्तर: जिन अमानवीय घटनाओं की ओर आपने संकेत किया है उनके मूल में संसार में उन-उन समाजों के लोगों में अज्ञान वश अपने बढ़े हुए संख्या बल का मद, झूठी श्रेष्ठता का अहंकार और भोग लिप्सा से उपजा लोभ लालच है। इतने अवगुण(आत्म-शत्रु ) जहां इकट्ठे हो जाएँ वहाँ उस व्यक्ति में आत्मा का बल ढँक जाता है।और ऐसे में उसे अगर मझहबी रहनुमाओं की सह (शै) और अपने समाज या समुदाय तथा किसी सत्ता की मुखर मूक सहमति मिल जाए तो वह ऐसी दुर्दांत दुर्घटना या वारदात कर बैठता है जो विश्व के हर व्यक्ति की (सामूहिक )चेतना को सैकड़ों वर्ष पीछे के क़बीलाई अंधकार में धकेल देती है। प्रजातंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग, प्रजातांत्रिक ढंग से ही विधिवत त्वरित न्याय कर दण्ड, सामाजिक बहिष्कार आदि के द्वारा, उसके सदुपयोग में रूपांतरित किया जा सकता है।
आपका प्रश्न विश्वात्मा के गाल पर पड़े तमाचे जैसा तो है ? किंतु लाभ क्या? क्योंकि उसे आपका तमाचा महसूस होगा भी या नहीं ? कहा नहीं जा सकता । एक रोग होता है जिसमें अंग तो बने रहते हैं पर उनमें संवेदना नहीं रहती। वैश्विक मानव समाज के कलेवर का एक हिस्सा ऐसा ही हो गया है कि वह बस है ।लेकिन, उसकी संवेदना मर गई है।भारत के कन्हैया लाल की हैरत, ईरान की महसा अमीनी की आख़िरी चीखें या अमेरिका के ज़ोर्ज फ्लोएड की अंतिम साँस की पीड़ा कौन विश्व गुरु या विश्वात्मा महसूस कर रहा है? निर्वीर्य और निस्तेज होना तो और बात है पहले वह संवेदनशील तो बने ? करुणा ही न रहे तो तप,सत्य, धर्म, न्याय की बात ही अन्याय अधर्म असत् और आडम्बर मात्र रह जाती है। करुणा बिना सम भाव के व्यवहार में प्रकट नहीं होती। समता आदि-अंत रहित सनातन विद्यमान दृष्टि का विज्ञान सम्मत लक्षण है। न्याय करने के लिए न्यायाधीश/जन-सामान्य की दृष्टि भी वैसी ही होनी चाहिए। तभी वह न्याय करने का निमित्त बन सकेगा और अन्याय को अन्याय कह सकेगा।
सृष्टि के सनातनी इतिहास में अनेक दौर ऐसे आए हैं जिनमें सनातनी दृष्टि की असीमित विशालता ही उसके मानवीय मन में अस्तित्व वान बने रहने के लिए प्रश्न बनी दिखी। क्योंकि सनातनी दृष्टि न तो किसी समाज, न समुदाय, न परिवार, न सांसारिक सम्बंध तक ही स्वयं को सीमित करती है बल्कि सम्पूर्ण अस्तित्व को ही स्वयं में स्थित और सम देखती है ।

तो, ऐसे समय में जबकि पृथ्वी पर रहने वाले अधिकांश मनुष्य स्वयं को किसी न किसी परिवार, समूह, समाज, मझहब, देश आदि जैसी अपेक्षाकृत क्षुद्र विभाजित दृष्टियों को ही अपनी परम अस्मिता मानकर संसार को देखते हैं और तदनुकूल आचरण करते हैं और, उन दृष्टियों के रक्षक/सिपाही हो जाते हैं तो वे यथार्थ परम दृष्टि (सनातन दृष्टि )का दर्शन करने के पात्र ही कैसे हो सकते हैं? और जब पात्रता ही वर्तमान के ऐसे विभाजित परिदृश्य में समस्या है तो सनातनी दृष्टि के रक्षक/सिपाही अपना संख्या बल बढ़ाएँ तो बढ़ाएँ कहाँ से और कैसे बढ़ायें ? क्योंकि, विभाजन-कारियों की तरह न तो वे कोई आध्यात्मिक प्रलोभन ही दे सकते हैं और न ही कोई सांसारिक लोभ दिखा सकते हैं।
और, जब मनुष्य ही जिसे धारण न कर पाएँ तो वह दृष्टि विलुप्त न होगी तो उसका और क्या होगा? क्योंकि दृष्टि के प्राकट्य का माध्यम तो मानव का मन /हृदय /चेतना ही है।
कृष्ण ने अर्जुन को इसी योग-दृष्टि के बहुत काल तक विलुप्त बने रहने का कारण मनुष्यों में ऐसी ही अपात्रता के होने को बताया था।
उनके उदाहरण से यही सीख लेकर कि कैसे पात्रता प्राप्ति का पर्यावरण बना रहे वह विलुप्त न होने पाए, विश्व के जागृत मनीषियों को निरंतर कर्तव्य करते हुए अपना उत्तरदायित्व निभाना चाहिए ताकि वैसी स्थित वर्तमान / भविष्य में पुनः प्रभावी न होने पाए जिससे कि सनातन दृष्टि, सनातन बुद्धि या चैतन्य प्रकट न रहकर गुप्त हो जाए। क्योंकि उस दृष्टि के विलुप्त होने का परिणाम मानवता तथा सम्पूर्ण सृष्टि दोनों के लिए विभाजन-कारक विनाशकारी, पतन-कारक होता है। इसलिए वैश्विक समाज में सुपात्रों की कमी नहीं होनी चाहिए। और, पात्रता प्राप्ति में तो निरंतर अभ्यास /कर्तव्य की बड़ी भूमिका है। अभ्यास की अर्हता देखकर ही गुरु वचन के माध्यम से उचित और आवश्यक योग का अभ्यास बताया जाता है।जिससे व्यक्ति योग्य बने।कृपा से अधिकार मिल भी जाए तो बिना पात्रता के वह ठहरेगा कैसे ? इसलिए पात्रता अहम है।
तत्वतः परम दिव्य दृष्टि ही सृष्टि की जननी है उसी में और उसी से सब किसी का अस्तित्व है।इस तरह वह उदारतम और विशालतम है। इसलिए समाप्त तो वह (दृष्टि) हो नहीं सकती पर, मनुष्य की पहुँच से दूर या अदृश्य विलुप्त वह अवश्य हो सकती है।और, जब मनुष्य की दृष्टि में ही उदारता या विशालता न होगी तो उसके सृजन में करुणा कैसे और कहाँ से प्रकट होगी?
वैसी स्थिति में ज़ाहिर है कि एक वर्ग कुकृत्य करेगा तो दूसरा वर्ग इतना निर्वीर्य निस्तेज होगा कि कुकृत्यों व अन्याय का प्रतिरोध कर न्याय स्थापित करने के लिए कटिबद्ध भी न हो सकेगा। और एक वर्ग जहां क्षद्म उदारता के खोल में दुबक कर काल कवलित होता रहेगा और कीर्ति स्थापित नहीं कर पाएगा वहीं दूसरा वर्ग अपने अल्पकालिक लाभ (यश/प्रसिद्धि या त्रि-एषणाओं हेतु) लोभ में किए कुकृत्यों के परिणामों से स्वयं विनष्ट होता रहेगा । पुरुषार्थियों व योगियों को ऐसा होने देने से रोकना चाहिए।
शाश्वत चैतन्य को दैनिक व्यवहार में उतारना अर्थात् उसका निरंतर अभ्यास करना ही मानव को उसके आंतरिक, बाह्य और मध्य तीनों तरह के पर्यावरणीय संकट से उबार सकता है। न्याय समता पर आश्रित है। और समता बृहत्तर वैश्विक समाज से लेकर गृहस्थ के अपने घर तक सर्वत्र केवल चरित्रवान व्यक्तियों को लोक जीवन के सभी क्षेत्रों (जैसे सामाजिक, राजनीतिक, आध्यात्मिक, धार्मिक, व्यावसायिक आदि ) में शक्ति सम्पन्न बनाने के माध्यम से ही बलवती होती है। मानव जीवन चरित्र प्रधान है। चरित्र हीनता ज्ञान को भी अज्ञान में बदल देती है। और चरित्र वान होने पर अज्ञानी भी ज्ञान-प्राप्ति के पात्र होते जाते हैं।चरित्र की प्रतिष्ठा से मूल्यों की प्रतिष्ठा होती है क्योंकि केवल चरित्रवान व्यक्ति ही मूल्यों की प्राण-प्रतिष्ठा कर सकते हैं। और जब समाज में मूल्य प्रतिष्ठित हों तो हरेक की दृष्टि में न्याय और अन्याय में जो फ़र्क़ होता है वह साफ़ बना रहता है जिससे न्याय के लिए और अन्याय के ख़िलाफ़ कोई भी आवाज़ उठा देता है। बिना चरित्रवान हुए निर्भय होना असम्भव है।
शिष्यों के हैं शिष्य जो अरि-मित्रों के मित्र ।
गुरुओं के गुरु हैं वही जो उज्ज्वल धवल चरित्र॥यह स्मरण अहंकार से सावधान रहने में सहज सहायक सिद्ध होता आया है।क्योंकि निर्भय होना हठी या अहंकारी होना भी तो नहीं है।

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