Have Religious Followers Violated Their Fundamental Beliefs

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प्रश्न: गुरु जी, मेरी दृष्टि में सनातन धर्म का मूल सत्य है यह उसी पर टिका है बौद्ध धर्म करुणा पर आश्रित है और जैन धर्म अहिंसा पर।और सभी अब्राह्मिक धर्म किसी किसी न किसी पैग़म्बर या मसीहा के होने पर टिके हैं । होने को तो अन्य भी अनेकों धर्म हैं पर ये ही विश्व में बहु प्रचलित धर्म हैं मेरा प्रश्न ये है कि क्या ऐसी कुछ घटनाएँ कभी भी इतिहास या वर्तमान में हुई हैं कि कोई धर्म धारी अपने मूल आधार के विरुद्ध ही आचरण करते पाए गए हों? मेरा उद्देश्य किसी धर्म की आलोचना का नहीं है बल्कि आप बता सकते तो, बस अपनी जिज्ञासा शांत करने भर का है।

 

उत्तर: पहली बात तो यही है कि विभिन्न धर्मों के जो ये आधार आपने बताए हैं मेरी दृष्टि में से कुछ के आधार आपके बताए आधारों तक सीमित नहीं हैं उदाहरण के लिए सनातन धर्म में सत्य अपनी पूर्णता में पहुँचने पर स्वयं को, सनातन का अंश पाता है, सत्य स्वयं ही सनातन से उद्भूत है। उपनिषदों में तो इस तात्त्विक विस्तार की छटा ही कुछ और दिखती है ।पर बहु प्रचलित ग्रंथों के हवाले से कुछ कहें तो बहुत पहले ही भगवान कृष्ण ने गीतोपदेश में ब्रह्म के सत् व असत् के द्वन्द से परे होने का संकेत कर दिया था । बौद्ध और जैन दोनों जिज्ञासा प्रधान मत हैं ।सब लोग अहिंसा का पालन करते हुए अपनी जिज्ञासा शांत कर कैवल्य और निर्वाण पा सकें वे व्यक्ति के जीवन में ऐसे चरित्र और व्यवहार के पक्षधर हैं । हाँ अब्राहमिक मत अवश्य किसी न किसी मसीहा और पैग़म्बर के होने पर टिके हैं । उन मतों के मानने वालों को केवल इतना ही कहना है कि मैं अमुक मसीहा या पैग़म्बर को ईश्वर का दूत या पुत्र तथा अपना उद्धारक मानता हूँ। अनुयायी की स्वयं की स्वतंत्र समझ, अनुभव, अनुभूति और व्यवहार तथा चरित्र इसके बाद ही महत्व के हैं इसके पहले नहीं। आपके प्रश्न का दूसरा हिस्सा बहुत स्पष्ट नहीं है कि धर्म-धारी से आपका आशय किन्ही मुख्य चरित्रों जैसे भगवान राम, कृष्ण, महावीर, गौतम बुद्ध इत्यादि से है या ऋषिओं संतों विशिष्ट भक्तों या संरक्षण देने वाले शासकों शासनों या काल विशेष के दौरों में अनुयायियों आदि से ? एक नहीं अनेकों उदाहरण हैं जब किसी भी धर्म या मत को मानने वाले, अनेकों व्यक्ति जो आपने गिनाए उन गुणों से, विलग आचरण करते देखे गए हैं।पर, यह आध्यात्मिक स्तम्भ है इसलिए मैं यहाँ उदाहरण देना उचित नहीं । कोई भी इतिहास विद -अनेकों उदाहरण आपको दे देगा।
और, आज भी ऐसे उदाहरण देखे ही जाते हैं वह देखने के लिए तो बस हमें या आपको ध्यान से अख़बार ही पढ़ना है खबरें आज के समाज के आचरण का दर्पण दिखा ही देतीं हैं और हमारा स्वयं अपना अपना दैनिक जीवन का साक्षी भाव से अवलोकन करना मात्र पर्याप्त उदाहरण प्रस्तुत कर देता है।
किंतु अब्राह्मिक मत के मानने वाले अपने मूल से नहीं हट सकते क्योंकि उससे हटते ही उनका मत स्वतः परिवर्तित हो जाता है। इसलिए वे हट ही नहीं सकते क्योंकि उनके मत बिलीफ़ पर आश्रित हैं उन्हें केवल इतना ही कहना है कि मैं केवल अमुक मसीहा या पैग़म्बर को ईश्वर का दूत या पुत्र तथा अपना उद्धारक मानता हूँ अन्य किसी को नहीं, फिर वे कुछ भी करते रहें। जबकि सारे इंडिक धर्म चरित्र पर आश्रित हैं। व्यवहार पर आश्रित हैं ।इसलिए धर्म कहलाते हैं। इसीलिए इन धर्मों में तत्वतः सभी व्यक्ति निर्वाण स्वरूप माने गए हैं । इसलिए सभी में उद्धारक और प्रवाचक प्रचारक प्रसारक होने का सामर्थ्य अंतर्निहित है सभी ईश्वर की संतति और अंश माने गए हैं। साधना काल में उनमें केवल चैतन्य की अवस्था /आयतन/ विमाओं का अंतर बना रहता पाया और देखा जाता है। सभी उसी एक के भिन्न-भिन्न अवतरण हैं। परमात्मा से विलग होना यहाँ अकल्पनीय है सनातन गुरु शिष्य परम्परा इसकी साक्षी और सदा विद्यमान प्रकट प्रमाण बनी हुई है। पर, यह सामर्थ्य उन्हीं में प्रकट होती है जो चरित्र और व्यवहार से उस अर्ह्यता, योग्यता, पात्रता और अधिकार को प्राप्त हो जाते हैं जो मोक्ष /कैवल्य/ निर्वाण दायक है। अब्राह्मिक मतों के अनुयायियों के लिए, उनकी पुस्तक में ऐसा विचार करना भी मत-विरुद्ध और दंडनीय घोषित है और, अन्य जीवों की तो बात ही क्या कही जाए मनुष्य के लिए भी तत्वतः परमात्मा से संलग्न होना वहाँ अकल्पनीय है।
संलग्नता और विलगता का यह अंतर धि के शुद्ध होने की अवस्था में ही स्पष्ट होता है। अशुद्ध अपरिष्कृत बुद्धि की अवस्था में वही अहंकार का कारक बन जाता है।अहंकार अंतिम और प्रथम अशुद्धि है।
पॉप्यूलरिटी की दृष्टि से विश्व के मानस पटल पर आज इंडिक समझे और कहे जाने सभी धर्मों में, मात्र पृथ्वी पर जन्मी ही नहीं बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड की प्रत्येक वर्तमान और संभावित जीवात्मा के लिए उसके अपने स्वतंत्र अस्तित्व और विकास के लिए जन्म सिद्ध अधिकार की व्यवस्था सनातन स्वरूप से उपलब्ध है। ऋषियों मुनियों द्वारा परमात्मा की एक कला परम स्वातंत्र्य अनुभूत की जाती है इसलिए वह स्वयं परम स्वतंत्र है ऐसा वर्णित व व्यक्त किया जाता है। तो उसके अंश और अवतरण अपने स्व-पर, परस्पर और परात्पर जीवन व्यवहार में निजी चरित्र के साधन/माध्यम/निमित्त से स्वातन्त्र्य को परम स्थान दें क्या यह जीवन-मुक्त महात्माओं की सहज स्वाभाविक स्व-अनुशासित, गुरु-आज्ञा और, व्यवहारिक चारित्रिक मर्यादा नहीं हो जाती? बिना स्व-अनुशासन के तो प्रजातंत्र भी अपनी परिपक्व अवस्था तक नहीं पहुँच सकता। स्व-अनुशासन की परिपक्व अवस्था ही मर्यादा कही जाती है। जिज्ञासा मर्यादा में रहकर चलने से ही शांत होती है।

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